यहां देवी सती की आंखें गिरी थीं, इसलिए इसे नैना देवी कहा जाता है। पर्वत पर स्थित यह मंदिर श्रद्धा और भक्ति का प्रतीक है। नवरात्रों में यहां लाखों भक्त दर्शन करने आते हैं।
वैष्णो देवी मंदिर (कटरा, जम्मू-कश्मीर)
त्रिकूट पर्वत की गोद में स्थित यह मंदिर मां वैष्णो देवी का अत्यंत प्रसिद्ध धाम है। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से “जय माता दी” कहकर यहां आते हैं, उनकी हर मनोकामना पूरी होती है।
कामाख्या देवी मंदिर (गुवाहाटी, असम)
नीलांचल पर्वत पर स्थित यह शक्तिपीठ देवी सती के 51 शक्तिपीठों में से एक है। यह मंदिर विशेष रूप से तांत्रिक साधनाओं के लिए प्रसिद्ध है। यहां प्रतिवर्ष अंबुबाची मेला आयोजित होता है।
ज्वाला देवी मंदिर (कांगड़ा, हिमाचल प्रदेश)
यहां मां की “ज्वाला” रूप में पूजा होती है। मंदिर में धरती से स्वयं निकलती हुई अग्नि ज्वालाएं देवी की शक्ति का प्रतीक मानी जाती हैं। यह भी 51 शक्तिपीठों में से एक है।
चिंतपूर्णी देवी मंदिर (हिमाचल प्रदेश)
यहां मां चिंतपूर्णी “चिंता हरने वाली” के रूप में पूजी जाती हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि मां के चरणों में अपनी व्यथा कहने से जीवन की सभी चिंताएं समाप्त हो जाती हैं।
दुर्गा कुंड मंदिर (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
काशी नगरी में स्थित यह लाल रंग का भव्य मंदिर मां दुर्गा के “महिषासुरमर्दिनी” रूप को समर्पित है। कहा जाता है कि यहां स्नान करने और पूजा करने से सभी पाप धुल जाते हैं।
कालीघाट काली मंदिर (कोलकाता, पश्चिम बंगाल)
मां काली के 51 शक्तिपीठों में यह अत्यंत पूजनीय स्थल है। यहां देवी सती के दाहिने पैर की उँगली गिरी थी। लाखों भक्त मां के दर्शन के लिए वर्षभर यहां आते हैं।