Published on: March 13, 2026
धरती से हजारों किलोमीटर ऊपर अंतरिक्ष में एक ऐसा खतरा तेजी से बढ़ रहा है जिसे आम लोग देख नहीं सकते, लेकिन वैज्ञानिक लगातार उससे चिंतित हैं। यह खतरा किसी ग्रह या उल्कापिंड से नहीं बल्कि इंसानों द्वारा छोड़े गए अंतरिक्ष मलबे से पैदा हुआ है। रिपोर्ट बताती हैं कि पृथ्वी की कक्षा में करोड़ों छोटे-छोटे टुकड़े तेज रफ्तार से घूम रहे हैं। अगर इनकी संख्या इसी तरह बढ़ती रही तो भविष्य में सैटेलाइट मिशन, अंतरिक्ष स्टेशन और वैश्विक संचार व्यवस्था तक प्रभावित हो सकती है। आखिर यह मलबा बना कैसे और क्यों वैज्ञानिक इसे आने वाले समय की बड़ी चुनौती मान रहे हैं?
1957 में जब पहला सैटेलाइट अंतरिक्ष में भेजा गया, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि एक दिन अंतरिक्ष में भी कचरे की समस्या खड़ी हो सकती है। पिछले 69 वर्षों में दुनिया के अलग-अलग देशों ने 19 हजार से अधिक सैटेलाइट अंतरिक्ष में लॉन्च किए हैं। इनमें से लगभग 11 हजार अभी भी सक्रिय हैं और पृथ्वी की निचली कक्षा यानी लो अर्थ ऑर्बिट में काम कर रहे हैं। लेकिन इनके साथ-साथ बड़ी संख्या में निष्क्रिय सैटेलाइट, रॉकेट के टूटे हिस्से और पुराने उपकरण भी वहीं रह गए हैं। यही वस्तुएं समय के साथ टूटकर स्पेस डेब्रिस बन जाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार यह बढ़ता हुआ मलबा भविष्य में अंतरिक्ष अभियानों के लिए गंभीर खतरा पैदा कर सकता है।
13 करोड़ छोटे टुकड़े बना रहे खतरनाक जाल
अंतरिक्ष एजेंसियों के आंकड़े बताते हैं कि पृथ्वी की कक्षा में मौजूद मलबे की वास्तविक मात्रा कल्पना से कहीं अधिक है। अमेरिका का स्पेस सर्विलांस नेटवर्क लगभग 40 हजार बड़े ऑब्जेक्ट्स पर लगातार नजर रखता है। हालांकि वैज्ञानिकों के अनुसार असली खतरा उन छोटे टुकड़ों से है जिन्हें ट्रैक करना लगभग असंभव है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के अनुमान के मुताबिक पृथ्वी की कक्षा में करीब 13 करोड़ छोटे टुकड़े तैर रहे हैं। इनका आकार भले ही कुछ मिलीमीटर या सेंटीमीटर का हो, लेकिन अंतरिक्ष में इनकी रफ्तार इतनी अधिक होती है कि ये किसी सैटेलाइट के लिए गंभीर खतरा बन सकते हैं। यही वजह है कि अंतरिक्ष वैज्ञानिक अब ऑर्बिटल डेब्रिस समस्या को तेजी से बढ़ती वैश्विक चुनौती मान रहे हैं।

28,500 किमी/घंटा की रफ्तार और टक्कर का खतरा
अंतरिक्ष में घूम रहे ये मलबे के कण लगभग 28,500 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगाते हैं। इतनी तेज रफ्तार से टकराने पर एक छोटा टुकड़ा भी किसी सैटेलाइट के सोलर पैनल, संचार उपकरण या नेविगेशन सिस्टम को गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है। कई बार संभावित टक्कर से बचने के लिए अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) को भी अपनी कक्षा बदलनी पड़ती है। यदि ऐसी घटनाएं बढ़ती रहीं तो GPS, मौसम उपग्रह और वैश्विक संचार नेटवर्क जैसी महत्वपूर्ण सेवाओं पर असर पड़ सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ता हुआ स्पेस जंक आने वाले वर्षों में अंतरिक्ष मिशनों की लागत और जोखिम दोनों को बढ़ा सकता है।
केसलर सिंड्रोम: टक्कर से टकराव की खतरनाक श्रृंखला
वैज्ञानिक जिस सबसे गंभीर स्थिति से चिंतित हैं, उसे केसलर सिंड्रोम कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार यदि अंतरिक्ष में मलबे की मात्रा एक निश्चित सीमा से अधिक हो जाती है, तो एक टक्कर कई नई टक्करों की श्रृंखला शुरू कर सकती है। इससे लगातार नया मलबा बनता जाएगा और लो अर्थ ऑर्बिट एक खतरनाक क्षेत्र में बदल सकता है। कुछ पुराने सैटेलाइट्स को जोखिम कम करने के लिए ग्रेवयार्ड ऑर्बिट में भेज दिया जाता है, जो पृथ्वी से लगभग 36,500 किलोमीटर दूर है। इसके बावजूद बड़ी मात्रा में तकनीकी मलबा अभी भी पृथ्वी की कक्षा में मौजूद है। विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर ट्रैकिंग तकनीक, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और मलबा हटाने की नई तकनीकों के बिना अंतरिक्ष का सुरक्षित उपयोग भविष्य में मुश्किल हो सकता है।
अंतरिक्ष विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दशक में स्पेस डेब्रिस प्रबंधन अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष नीति का सबसे महत्वपूर्ण विषय बन सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार यदि अभी कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में सैटेलाइट लॉन्च करना भी जोखिम भरा हो सकता है।