मदद मांगी गई थी एक कमरे की, बना डाला पूरा 'संसद' जैसा स्कूल

Published on: December 25, 2025

मदद मांगी गई थी एक कमरे की, बना डाला पूरा ‘संसद’ जैसा स्कूल

राजस्थान के जालोर जिले का एक सरकारी स्कूल इन दिनों देशभर में चर्चा का विषय बना हुआ है। वजह सिर्फ इसकी भव्य इमारत नहीं, बल्कि इसके पीछे छिपी वह कहानी है, जिसने एक साधारण मांग को ऐतिहासिक रूप दे दिया। जिस स्कूल में कभी बच्चे जमीन पर बैठकर पढ़ते थे, आज वही स्कूल आधुनिक सुविधाओं और संसद से प्रेरित डिजाइन के साथ खड़ा है। यह कहानी है यादों, मां की सीख और गांव के बच्चों के भविष्य को बदलने वाले एक फैसले की।


सोशल मीडिया पर छाया संसद जैसा सरकारी स्कूल

राजस्थान के जालोर जिले के दादाल गांव में स्थित एक सरकारी स्कूल इन दिनों सोशल मीडिया पर खूब सुर्खियां बटोर रहा है। पहली नजर में इस स्कूल की इमारत किसी आम शैक्षणिक भवन जैसी नहीं लगती, बल्कि इसकी बनावट और गोलाकार संरचना संसद भवन की याद दिलाती है। यही वजह है कि लोग हैरानी के साथ इसकी तस्वीरें साझा कर रहे हैं। आमतौर पर सरकारी स्कूलों को संसाधनों की कमी से जोड़ा जाता है, लेकिन यह स्कूल उस सोच को पूरी तरह बदल देता है। गांव के बीच खड़ी यह भव्य इमारत अब सिर्फ शिक्षा का केंद्र नहीं, बल्कि पूरे इलाके की पहचान बन चुकी है। लोग इसे देखकर यह मानने लगे हैं कि अगर सोच सही हो, तो सरकारी व्यवस्था में भी बड़ा और सकारात्मक बदलाव संभव है।


एक कमरे की मांग से पूरे स्कूल का सपना

इस स्कूल की कहानी किसी बड़ी योजना से नहीं, बल्कि एक छोटी सी जरूरत से शुरू हुई थी। स्कूल प्रशासन ने एक व्यक्ति से केवल एक अतिरिक्त कमरे के निर्माण की बात कही थी। लेकिन उस व्यक्ति ने इस मांग को सीमित नजरिए से देखने के बजाय बड़ा सोचने का फैसला किया। उनका मानना था कि अगर मदद करनी है, तो वह ऐसी होनी चाहिए जो लंबे समय तक असर छोड़े। यही सोच धीरे-धीरे एक पूरे स्कूल के निर्माण के संकल्प में बदल गई। पहले योजना छोटी थी, लेकिन समय के साथ उसका दायरा बढ़ता गया। यह बदलाव किसी मजबूरी से नहीं, बल्कि गांव के बच्चों के लिए बेहतर भविष्य की चाह से पैदा हुआ था।

किसने बनवाया है स्कूल

इस भव्य स्कूल के निर्माण के पीछे अमेरिका में रहने वाले एनआरआई डॉक्टर अशोक जैन का नाम है। उनका इस स्कूल से रिश्ता सिर्फ दानदाता का नहीं, बल्कि एक पूर्व छात्र का भी है। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई इसी स्कूल में की थी, जब सुविधाओं का नामोनिशान नहीं था। बच्चे जमीन पर बैठकर या पेड़ों की छांव में पढ़ाई करते थे। बाद में परिवार के साथ वह गांव से बाहर चले गए, पहले बेंगलुरु और फिर पढ़ाई व करियर के सिलसिले में अमेरिका पहुंचे। खेलों में रुचि, मेडिकल पढ़ाई और विदेश में सफल प्रैक्टिस के बावजूद उनका जुड़ाव अपने गांव और स्कूल से कभी खत्म नहीं हुआ। यही जुड़ाव उन्हें वापस इस स्कूल तक ले आया।


मां की सलाह, संविधान की प्रेरणा और गांव का सहयोग

साल 2020 में गणतंत्र दिवस के मौके पर डॉक्टर अशोक जैन को स्कूल में अपने अनुभव साझा करने के लिए बुलाया गया। तब उन्होंने देखा कि स्कूल की हालत अब भी वैसी ही है, जैसी उनके बचपन में थी। जब प्रधानाचार्य ने एक कमरा बनवाने की बात कही, तो उन्होंने हामी भर दी। लेकिन जब यह बात उन्होंने अपनी मां को बताई, तो मां ने साफ कहा कि एक-दो कमरों से कुछ नहीं बदलेगा, पूरा स्कूल बनना चाहिए। उसी दिन स्कूल के निर्माण का फैसला लिया गया। डिजाइन को संविधान और लोकतंत्र से जोड़ते हुए संसद से प्रेरित रखा गया। जमीन की कमी को गांव वालों और सरकार के सहयोग से दूर किया गया। करीब पांच एकड़ जमीन जुटने के बाद काम शुरू हुआ, जो कुछ रुकावटों के बाद पूरा हुआ।


आधुनिक सुविधाओं से बदली स्कूल की तस्वीर

करीब सात करोड़ रुपये की लागत से बने इस स्कूल में अब 22 आधुनिक क्लासरूम हैं। लकड़ी की डेस्क, डिजिटल बोर्ड, साइंस और कंप्यूटर लैब पढ़ाई को आसान बनाते हैं। बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए स्किल डेवलपमेंट क्लास और खेल के लिए सात कोर्ट तैयार किए गए हैं। 23 शौचालय, बड़ा किचन, स्टोर और ऑडिटोरियम जैसी सुविधाएं भी मौजूद हैं। स्कूल को वाई-फाई से जोड़ा गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर ऑनलाइन पढ़ाई हो सके। आने वाले समय में यहां स्पोर्ट्स एकेडमी शुरू करने की योजना है, जिससे गांव के बच्चे अपनी प्रतिभा को नई उड़ान दे सकें।


निष्कर्ष

जालोर का यह स्कूल साबित करता है कि बदलाव के लिए बड़े पद नहीं, बड़ी सोच की जरूरत होती है। एक व्यक्ति की पहल, मां की सीख और गांव के सहयोग ने शिक्षा की तस्वीर बदल दी। यह स्कूल अब सिर्फ इमारत नहीं, बल्कि उम्मीद और भविष्य का प्रतीक बन चुका है।

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